“सम्मान हेतु कृतज्ञता ज्ञापन”


हम वैदिक विचारधारा के प्रचारार्थ जो लेख आदि लिखते हैं उसे अनेक पाठक एवं मित्र पसन्द करते हैं। कुछ लोग समय समय पर फोन आदि कर अपनी शुभकामनायें एवं आशीर्वाद हमें प्रदान करते रहते हैं। इससे हमें कार्य करने का उत्साह उत्पन्न होता है। हिमाचल प्रदेश के पौण्टा साहब स्थान के निवासी श्रद्धेय श्री कृष्ण लाल डंग जी हमारे कार्यों व गतिविधियों से परिचित हैं। उन तक भी हमारे लेख आदि पहुंचते हैं। उनका कई महीने पहले एक बार फोन आया था जब उनसे विस्तार से वार्तालाप हुआ था। हमें तब यह जानकर अतीव प्रसन्नता हुई थी कि आप आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान ऋषिभक्त आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी के पूज्य पिता हैं। आचार्य आशीष जी देहरादून स्थित वैदिक साधन आश्रम तपोवन में निवास करते हैं तथा यहीं रहकर देश विदेश में प्रचारार्थ आते जाते हैं। आश्रम में आपके द्वारा समय समय पर युवक व युवतियों के लिये अनेक शिविरों का भी आयोजन किया जाता है। हमें वेदिक साधन आश्रम, गुरुकुल पौंधा, आर्यसमाज देहरादून, द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल देहरादून सहित टीवी पर भी आपके व्याख्यान सुनने का गौरव प्राप्त हुआ है। 

श्रद्धेय श्री कृष्ण लाल डंग जी हमारे लेखन कार्य एवं उसमें निहित भावना को अनुभव कर हमारा अर्थ प्रदान कर सम्मान करना चाहते थे। हमें जब जब सम्मान करने का प्रस्ताव मिला है तो हम अपने कार्यों पर विचार करते हैं। हम जो कर रहे हैं वह हमारा कर्तव्य है। इसकी प्रेरणा हमें ऋषि दयानन्द और उनके प्रमुख शिष्यों के जीवन चरित्र पढ़कर तथा दूसरे मत के लोगों द्वारा अपने मत के प्रचार कार्य को देखकर हुई है। वैदिक धर्म का अधिक से अधिक प्रचार हो, हम से जो हो सकता है हमें भी करना चाहिये, इस भावना से ही हमने आर्यसमाज में रहकर लेखन द्वारा कुछ सेवा करने का प्रयास किया है। सम्मान की बात सुनकर हमें आत्मालोचन कर इसे प्राप्त करने में सदैव संकोच हुआ है। हम कार्य तो करते हैं परन्तु उसके लिये हमें आर्थिक सहयोग व अनुदान मिले और हम उसे स्वीकार करें, हमें उचित नहीं लगता। मित्रों से समय समय पर चर्चा करने पर अधिकांश मित्रों ने सम्मान को स्वीकार करने की ही प्रेरणा व परामर्श दिया है। अतः हमें अनेक संस्थाओं व व्यक्तिगत सम्मानों को स्वीकार करना पड़ा है। 

आज हमें श्रद्धेय श्री कृष्ण लाल डंग जी ने प्रसिद्ध ऋषिभक्त विद्वान आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी के द्वारा सम्मानित किया है। उन्होंने हमें प्रचुर मात्रा में धन भी दिया है। इस सम्मान व सहयोग तथा दाता की भावना को अनुभव कर हम कृतज्ञता का अनुभव करते हैं। हमें नहीं पता कि हमने लो लेखन कार्य किया है उसके लिये हमें सम्मानित किया जाना भी चाहिये। हमने श्री कृष्ण लाल जी की भावनाओं को समझते हुए यह सम्मान एवं सहयोग सादर, सप्रेम, विनीत एवं कृतज्ञ भाव से स्वीकार किया है। हम उनका हृदय से धन्यवाद करते हैं और परमात्मा से उनके लिये स्वस्थ व सुखी जीवन एवं धन ऐश्वर्य की प्राप्ति सहित यश तथा कीर्ति की कामना करते हैं। ईश्वर उन्हें शतायु करें। श्री कृष्ण लाल डंग जी वैदिक धर्मानुसार साधनामय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वह ध्यान व यज्ञ सहित स्वाध्याय में विशेष रुचि रखते रखते हैं। हम ईश्वर से उनकी साधना की सफलता की भी कामना करते हैं। उन्होंने हमारा जो सम्मान किया है उसके लिये हम आजीवन व उसके बाद भी आभारी रहेंगे। 

श्री कृष्ण लाल डंग जी जीवन के 89 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं। उनका स्वास्थ्य ठीक व अच्छा कहा जा सकता है। वह अपनी जीवनचर्या को सुख व स्वाधीनता पूर्वक सम्पन्न करते हैं। श्री कृष्ण लाल जी अपने जीवन में वेटनरी डाक्टर रहे हैं। वह मध्य प्रदेश के चिकित्सा विभाग से संयुक्त निदेशक, वेटेनरी विभाग से सेवानिवृत हैं और वैदिक मान्यताओं एवं परम्पराओं के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। आपकी सहधर्मणी माता जी आर्यसमाजी परिवार की निष्ठावान अनुयायी रही हैं। वह दन्त चिकित्सक रही हैं। उन्हीं के प्रभाव से श्री कृष्ण लाल जी का जीवन वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के पालन में प्रवृत्त हुआ। उन्होंने माता जी के प्रभाव से वैदिक धर्म को मन, वचन व कर्म से अपनाया और अपने सुपुत्र यशस्वी आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी को वैदिक मिशन के प्रचारार्थ समर्पित किया है। आर्यसमाज उनके इस कार्य के लिये सदैव उनका ऋणी रहेगा। 

श्री कृष्ण लाल जी अपने सेवाकाल में एक अनुशासित एवं सत्यनिष्ठ अधिकारी रहे हैं। आपके जीवन में विभागीय सेवा करते हुए वह सभी गुण विद्यमान रहे हैं जो एक आर्य पुरुष में होने चाहिये। निर्भीकता भी आपका एक गुण रहा है। अनुशासित जीवन सहित आपने अपने सिद्धान्तों का पालन भी अपने सेवाकाल में किया है। आपने जीवन में दो या तीन आर्यसमाजों की स्थापनायें भी की हैं तथा समाज के पदाधिकारी भी रहे हैं। हम पुनः श्री कृष्ण लाल डंग जी के प्रति हमें सम्मानित करने के लिए हृदय से कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त करते हैं और उनका धन्यवाद करते हैं। 

-मनमोहन कुमार आर्य

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