विश्व शांति विषय पर ऑनलाइन अन्तर्राष्ट्रीय समारोह सोल्लास संपन्न


-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“जो व्यक्ति द्वेषपूर्ण विचारों से मुक्त रहता है वह निश्चित ही शांति को प्राप्त करता हैः आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री”

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैदिक विद्वान एवं अध्यात्म पथ के संपादक आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री जी ने ऑनलाइन विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि वैदिक मानवतावाद ही शांति  का शाश्वत मार्ग है। श्री शास्त्री ने यह बात कंसल्टेंट जनरल ऑफ इंडिया एवं सेवा इंटरनेशनल (ऑस्ट्रेलिया) के तत्वावधान में 20 दिसम्बर, 2020 को आयोजित कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रुप में अपने व्याख्यान में कही। उन्होंने कहा कि वेद मन्त्र “द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांति पृथ्वी शांति रापः” में मनुष्यों की ही नहीं अपितु सम्पूर्ण लोकों एवं जीवों के सुख व शांति की प्रार्थना की गई है। उन्होंने आगे कहा कि समन्वित होना ही वास्तविक शांति है। हारमोनियम में ‘सा रे ग म प ध नी’ ये सात प्रकार के स्वर होते हंै। सातों स्वरों में कोई ऊंचा, कोई मध्यम और कोई नीचा है। इन सातों स्वरों में जब समन्वय हो जाता है तब हारमोनियम से अनेक प्रकार के राग-रागिनियां निकलने लगती हंै। इसी समन्वय का नाम शांति है। प्रख्यात लेखक आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री जी ने यूनेस्को के विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा कि युद्धों का सूत्रपात मानव मन में होता है। सब एक दूसरे के निकट बैठे होते हैं परन्तु उनके मन एक दूसरे से इतने दूर हो जाते हैं जितने उनके देश एक दूसरे से होते हैं। वैदिक संस्कृति डिण्डिम घोष कर शांति की स्थापना के लिए कह रही है ‘श्रृण्वन्तु सर्वे अमृतस्य पुत्राः’ अर्थात् हे दुनिया के लोगों! तुम सब अजर - अमर भगवान की संतानें हों, भाई - भाई हो । भाई - भाई की भांति एक दूसरे के साथ व्यवहार करो।

आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री जी ने सुखी जीवन के 4 सूत्रों की चर्चा करते हुए कहा कि प्रथम - वस्तु का ‘आग्रह’ मत करो। जो मिले उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लो। दूसरा - जुबान से विग्रह मत करो क्योंकि जुबान पर लगी चोट ठीक हो सकती है परन्तु जुबान से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती। तीसरा - संपत्ति का ‘परिग्रह’ मत करो, क्योकिं अति परिग्रह व अति परिचय दुख का कारण बनता है। उतना मत कमाओ जितना तुम कमा सकते हो अपितु उतना कमाओ जिससे तुम ठीक से जिंदगी गुजार सकते हो। उतना मत खाओ जितना तुम खा सकते हो, उतना खाओ जिसको ठीक से पचा सकते हो। उतना गीत मत गाओ जितना तुम गा सकते हो, उतना गाओ जो ठीक से रिझा सकते हो। उतना संबंध मत बनाओ जितना तुम बना सकते हो, उतना संबंध बनाओ तुम जिसको ठीक से निभा सकते हो। 

चौथा- किसी भी व्यक्ति के प्रति ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित होकर व्यवहार मत करो। क्योंकि रात भर में दोस्त - दुश्मन और दुश्मन दोस्त बन जाता है। आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री जी ने अपने उद्बोधन में सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। श्रोतागण ऑनलाइन ताली बजाते हुए अचार्यश्री का अभिनंदन करते रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री राजकुमार जी (कंसल्टेंट जनरल ऑस्ट्रेलिया) ने किया । कार्यक्रम के संयोजक ऑस्ट्रेलिया निवासी श्री राजेंद्र कक्कड़ जी द्वारा इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए किये गए अथक प्रयास कार्यक्रम की सफलता और सुव्यवस्था को दर्शा रहे थे। मेलबर्न निवासी बहन श्रीमती प्रेम हंस जी का मुस्कराते हुए मधुर आवाज में संचालन अद्वितीय रहा। भजनोपदेशिका श्रीमती कविता आर्या एवं श्रीमती संगीता आर्या के भक्तिमय भजनों ने तो वातावरण को सरस अत्यंत मधुरमय कर दिया और सब दर्शक व श्रोता आनंद सागर में डूब गए। तत्पश्चात डॉ. सुषमा आर्या जी (आयुर्वेदाचार्य) ने तो लाल, पीले, हरे, सफेद रंग के फूल, फल एवं सब्जियों की स्वास्थ्य के लिए विविध उपयोगिताएं बतलाकर आयुर्वेद के ज्ञान की गंगा प्रवाहित कर दी। इसके उपरान्त श्री प्रेम हंस जी ने ऑस्ट्रेलिया की संस्था के कर्मठ पदाधिकारी श्रीमान् ओम जी से परिचित करवाया और उनको जन्म दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं भी दी गईं। 

श्री ओम जी ने भक्तिपरक भजन सुनाकर सबको भक्ति-मग्न कर दिया। ओम् जी ने ऑस्ट्रेलिया में लगभग 20 वर्ष से काव्यगोष्ठी कराते हुए हिंदी भाषा को जागृत किया हुआ है। श्री सुभाष शर्मा जी, संध्या नायर जी, हरिहर झा जी, निशा भटनागर जी और अरविंद गैंधर जी की कविताओं ने तो कवि सम्मेलन  जैसा समा बांध दिया। अंत में श्री विक्रांत ठाकुर जी (संचालक, सेवा इंटरनेशनल ऑस्ट्रेलिया) ने सभी कार्यक्रम में उपस्थित अतिथि वक्ता, सहयोगी-जनों तथा श्रोताओं को अन्तःकरण से धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में लोगों की उपस्थिति दर्शा रही है कि भारतवासियों को अपने बाहर गए बहन-भाइयों से कितना अधिक प्रेम है। उन्होंने कहा कि भारत ही वो देश है जो शांतिप्रिय है तथा विश्व-शांति चाहता है। उन्होंने वैदिक विद्वान चंद्रशेखर शास्त्री जी के लिये कहा कि उनकी हर बात मार्गदर्शक के रूप में थी। आचार्य विजयभूषण जी के मन मोहक भजन, शांतिपाठ एवं  जयघोष  के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम में सब सुंदर, सुनियोजित एवं प्रभावशाली था।