मेरी जाँ है


आज भी ये बातें उसके मेरे दरम्यां है

सौ गिले शिक़वे उससे पर मेरी जाँ है


जिस दिन देखा था उसको थकी हुए

मेरी बाहोँ में उसके विश्राम को हाँ है


सोचता हूँ छूटहि के दिन भर सोचूं मैं

उसके ख्याल मेरे लिए हमेशा जवां है


याद है बचपन मे उसकी चोटी खींचना

हैरत इतनी अब भी वो इतनी मेहरबाँ है


हमारे इश्क़ की कहानी में दम है इतना

नए चेहरों में दम ढूँढो तो मिलता कहाँ है


मैं आफ़ताब बनकर रहा अँधेरे में उसके

गवाही लेलो उसका दिल ही मेरा मकां है


हमदर्द में इश्क़ मिला या विरासत में यारों

मुझे लगता नहीं ऐसे मै जमीं वो आसमाँ है



कविता अशोक सपड़ा की दिल्ली से