बाल शोषण और खाद्य-मनोरंजन विभाग





वर्तमान समय में भारत देश में अपराध चरम सीमा पर है। जिनमें बाल शोषण, महिलाओं का शोषण, चोरी, ठगी, हत्याऐं, नशा आदि हैं। पुलिस प्रशासन द्वारा लाख कोशिशों के बाद भी अपराध रूक नही रहा है। सरकार द्वारा भी समय-समय पर संविधान में अपराध कम करने के उद्देश्य से सख्त से सख्त कानून बनायें जा रहे हैं। किन्तु उनकी इन कोशिशों के बावजूद भी अपराधि अपराध करने से नहीं चुक रहे हंै। यह विचार करने योग्य बात है कि आखिर अपराध क्यों हो रहे हैं। 

अपराधियों की नज़र सेः-

जब भी कोई अपराधि कोई अपराध करके जेल जाता है तोे वह एक ही बात कहता है कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा। अब अलग-अलग अपराधि के मन कि जाने तो वह कुछ ऐसा होता हैः-

बलात्कारियों- जब भी किसी व्यक्ति को बलात्कार के अपराध में गिरफ्तार किया जाता है और उससे पूछा जाये कि उसने बलात्कार क्यों किया तो अपराधी एक ही जवाब होगा कि पता नही या जाने उस समय पता नही क्या हो गया था। 

चोर- चोरी के आरोपी से पूछा जाये कि उसने ऐसा क्यों किया तो चोर का एक ही जवाब होगा कि रोजगार नहीं था, मजबूरी थी या काम करने कि इच्छा नही होती।

ठगी के अपराधी- ठगी के आरोपी से पूछा जाये कि उसने ऐसा क्यों किया तो ठगीकर्ता का एक ही जवाब होगा कि बिना मेहनत के कम समय में ज्यादा पैसा कमाने के लिए, अपनी बुरी आदतों की पूर्ती के लिए।

महिला व बालशोषण आरोपी- महिला के आरोपी से पूछा जाये कि उसने ऐसा क्यों किया तो अपराधी का जवाब होगा कि उत्तेजना, घरेलू कलेश आर्थिक तंगी, नशा, मानसिक तनाव व बच्चो का पढाई न करना, पता नहीं इत्यादि।

नशा- अगर किसी नशेडी से पूछा जाए कि वह नशा क्यों करता है। तो नशेड़ी जवाब होगा की अच्छा लगता है, घरेलू कलेश, संतुष्ठी के लिए, कोई मुझसे प्यार नही करता या मुझे अच्छा लगता है। 

अब देखा जाए तो इन सभी बातों में इंसानों कि संवेदनाये, उत्तेजना, आलस्य और माहौल, मार्गदर्शन आदि समान्य है। आखिर हम भारतवासियों के इन सभी भावनाओें के साथ ये सभी खिलवाड किसने किया है। आखिर किसने देवभूमि भारत, वीर भूमि भारत, संस्कृति भूमि भारत, अतिथी-देवों भूमि भारत, संस्कारी भूमि भारत, जीवन्त-मृत पितरों देवभूमि भारत, दया भाव भूमि भारत, को आखिर किसने ‘‘अपराध भूमि भारत’’ बना दिया।  

वैज्ञानिक शोधों, मनोचिकित्सकों, आयुर्वेदिक चिकित्सकों, सहित अन्य विशेषज्ञों एवं जानकारों के अनुासार जब शिशु माँ गर्व में होता है तो उन दिनो में माँ कि जैसी सोच होती है, घर का माहौल होता है, बच्चा आगे चलकर उसी के अनुरूप होता है। वहीं बच्चा जैसे माहौल में रहता है उस पर उसका भी काफी ­फर्क पड़ता है चाहे वह आस-पास का महौल हो या उसके मनोरंजन के लिए टेलिविजन के माध्यम से दिखाए जाने वाले दृष्य। साथ ही हमारे द्वारा खायें जाने वाला भोजन सबसे बडा जिम्मेंदार है। अंत मंे इन बातों को ज्यादा न खोलते हुए सिर्फ हमारे पुर्वजांे कि दो कहावतें कहकर विराम करता हूं। 

जैसे खाओगे अन्न वैसे होगा मन।

जैसी होगी संगत वैसे आयेगी रंगत। 

जय हिन्द       जय भारत 


जितेन्द्र ‘इंसान’

ग्राम-पोस्ट-मुण्डाला

जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड, भारत