"महर्षि दयानन्द व वेद" पर गोष्ठी सम्पन्न

 





धनसिंह—समीक्षा न्यूज 

गाजियाबाद। केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में "महर्षि दयानन्द सरस्वती व वेद" विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कोरोना काल में 222 वां वेबिनार था।

वैदिक विद्वान आचार्य हरिओम शास्त्री ने कहा कि लुप्त हुए वेदों को पुनः प्रस्तुत कर महर्षि दयानंद सरस्वती ने मानव जाति पर महान उपकार किया है। उन्होंने वेदों के सही स्वरूप को प्रस्तुत किया और अनेको भ्रांतियों का निवारण भी किया। इसीलिए ऋषि दयानन्द सरस्वती इस धरा पर आज वेदों वाले ऋषि के नाम से जाने जाते हैं। उनके धरा पर आने से पहले महाभारत काल से लेकर उन्नीसवीं सदी तक समस्त विद्वानों, तपस्वियों, लेखकों और कवियों सभी ने अपने अपने ग्रन्थों में नाम तो वेदों के लिए,वेदों का नाम लेकर अपने अपने विचारों व मतों को अपने शिष्यों में फैलाये परन्तु वेदों में वास्तव में क्या कहा गया है किसी ने भी न तो जाना और ना ही उसके लिए प्रयास किए।जब स्वामी दयानन्द सरस्वती गुरुवर प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द जी महाराज से मिले तो उन्होंने इन्हें वेदों की चाबी रूपी महर्षि यास्क द्वारा लिखित ग्रन्थ निरुक्त और निघण्टु तथा महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी एवं महर्षि पतंजलि के महाभाष्य को पढ़ाया। यही चारों ग्रन्थ *वेदज्ञान‌ की चाबी थे जिन्हें पढ़कर महर्षि दयानन्द जी ने वेदों में वर्णित रहस्यों को खोला और पंडितों को बताया कि जिस शंकासुर राक्षस को तुम वेदों को चुराकर ले जाने वाला कहते हो मैं उसी तुम्हारे आलस्य रूपी शंकासुर को मारकर वेदों को वापस ले आया हूं।अब दिखाओ कि जिस मूर्तिपूजा,श्राद्ध तर्पण और सती प्रथा आदि कुरीतियां वेदों में कहां लिखीं हैं।सायण,महीधर,उव्वट आदि भारतीय विद्वानों और कीथ,ग्रिफिथ,मैक्समूलर आदि विदेशी विद्वानों ने वेदों के अनर्गल और मानव तथा जीव मात्र विरोधी अपने वेदभाष्यों से वेदों को जनता में बदनाम कर दिया था।सामान्य भारतीय जनता तो वेदों का नाम तक सुनना नहीं चाहती थी।सन्त तुलसीदास आदि कवियों ने तो वेदों में राम स्तवन की बात भी कह डाली थी,कि चारों वेद तो रामजी के पावन चरित का ही वर्णन करते हैं। आचार्य श्री शंकर जी,आचार्य श्री रामानुज जी,आचार्य श्री वल्लभ जी,आचार्य श्री निम्बार्क जी आदि सभी आदरणीय प्रबुद्ध आचार्यों ने नाम तो वेदों का लिया और उनके नाम पर अपने अपने मत चलाये परन्तु वेदों में वास्तव में क्या बात कही गई है उसे किसी ने भी नहीं कहा।सृष्टि की रचना के साथ ईश्वर ने वेदों को अग्नि,वायु, आदित्य और अंगिरा नामक ऋषियों के माध्यम से क्यों प्रकट किए इसके पीछे क्या कारण है यह किसी ने भी नहीं जानने की कोशिश नहीं की। वेदों में वर्णित शब्दों के अर्थ यौगिक  होते हैं वे ऐतिहासिक व्यक्तियों,स्थानों, वस्तुओं के बोधक नहीं होते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति के समय वेदों की रचना हुई थी अतः बाद में लोगों ने वेदों से गुणवाचक सार्थक नामों को लेकर अपने अपने बच्चों, स्थानों,वस्तुओं के नाम रखे न कि इनसे वेदों ने नाम लिये।वेद सृष्टि के आदि काल से मानव मात्र का कल्याण करते आ रहे हैं इसलिए वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।इसलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी को वेदों वाला ऋषि कहा जाता है। एक कवि ने लिखा है-वेदों की बंशी हाथ में लेकर, महर्षि ने जब गीत सुनाए।

सारे जहां में छा गई मस्ती,झूम उठे सब अपने पराए।

केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कहा कि वेद सृष्टि का प्राचीनतम ज्ञान है,बाकी सब मतमतान्तर है हमें वेदों के सच्चे स्वरूप को अपनाकर मानवमात्र का कल्याण करना चाहिए।

उत्तर प्रदेश प्रान्तीय महामंत्री प्रवीण आर्य ने कहा कि वेदों के अलावा कल्याण का कोई मार्ग नहीं है।

मुख्य अतिथि आर्य नेत्री सुषमा बजाज,पूर्व विधायक राजेन्द्र बीसला व अध्यक्ष समाजसेवी बॉम्बे डाईंग के उपप्रधान रजनीश दत्त ने भी वेद मार्ग अपनाने पर जोर दिया।

गायिका पुष्पा चुघ, उर्मिला आर्या, दीप्ति सपरा, बिंदु मदान, संध्या पांडेय, सुषमा आर्या, जनक अरोड़ा, मधु सहगल, नरेश खन्ना, नरेंद्र आर्य सुमन, संगीता आर्या आदि ने गीत सुनाये ।

आचार्य गवेन्द्र शास्त्री, आनन्द प्रकाश आर्य, सौरभ गुप्ता, कमलेश हसीजा, प्रेम सचदेवा, वेद भगत, अरुण आर्य आदि उपस्थित थे।