मुंशी प्रेमचंद ने सामाजिक बुराइयों पर प्रहार कर इन्हें दूर करने का प्रयत्न किया: रामदुलार यादव


धनसिंह—समीक्षा न्यूज     

धनपत राय श्रीवास्तव से नबाब राय, मुंशी प्रेमचंद तक

साहित्यिक-यात्रा जन्म-दिवस 31 जुलाई 2021 पर विशेष:-

भारत ही नहीं विश्व पटल पर उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, विभिन्न विधाओं में हिंदी और उर्दू साहित्य को समृद्धि प्रदान करने वाले बेजोड़ लेखक मुंशी प्रेमचंद, धनपत राय, नबाब राय नाम से साहित्य सृजन करते रहे| उन्होंने समाज में व्याप्त विषमता, गरीबी, बेबसी, लाचारी, रुढ़िवाद, परम्परावाद, कुप्रथाओं, रीतिरिवाजों, शोषण, अन्याय, भ्रम, पाखण्ड को नजदीक से देखा था तथा अनुभव के आधार पर अपने उपन्यासों, कहानियों में उसे उजागर करने तथा इन सामाजिक बुराइयों पर प्रहार कर इन्हें दूर करने का प्रयत्न किया| उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता भी की| आप का जन्म 31 जुलाई 1880 में वाराणसी के नजदीक लमही नामक ग्राम में कायस्थ परिवार में हुआ था| इनका बचपन संघर्षमय रहा, इनकी शादी भी जब संपन्न हुई, उसके एक साल बाद पिता का साया भी छूट गया, माँ का निधन आपके बाल्यकाल में ही हो गया था| आपका पूरा जीवन संघर्षों का इतिहास है, लेकिन आप कभी भी निराश नहीं हुए, लगन और मेहनत करते हुए अध्ययनरत रहे| ट्यूशन करते हुए वे अपने परिवार तथा पढाई का खर्च खुद वहन कर रहे थे| 

मुंशी प्रेमचंद में सरलता, उदारता, करुणा, गरीबों, बन्चितों, एवं पीड़ितों के प्रति अपार-स्नेह कूट-कूट कर भरा था, वह प्रतिभाशाली, विचारवान, उदात्त गुणों से संपन्न महामानव थे| वह शहरों की चमक-दमक से दूर ग्रामीण जीवन से अधिक लगाव रखते थे, वे एक साल मुम्बई में रहे, लेकिन वहां का वातावरण रास नहीं आया, वे पुन: बनारस लौट आये उनका सारा जीवन बनारस और लखनऊ में बीता| वे एक सफल साहित्यकार hiही नहीं कुशल वक्ता, संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे, वे देश भक्त नागरिक के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे, उनकी एक कृति “सोजे-वतन” को अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया, तभी से वह प्रेमचंद नाम से लेखन कार्य संपन्न करते रहे| वह सर्वगुण संपन्न, विलक्षण प्रतिभावान साहित्यकार थे, उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास की झलक मिलती है| उन्होंने 15 उपन्यास, 300 कहानियां, 3 नाटक, अनेंकों अनुवाद, बाल साहित्य का सृजन किया तथा पूरे विश्व में ख्याति अर्जित की| वे सामाजिक असमानता तथा रुढ़िवाद पर बराबर चोट करते रहे| महान साहित्यकार, मूर्धन्य आलोचक डा0 हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मुंशी प्रेमचंद के बारे में कहा है कि “जनता के आचार-विचार, व्यवहार, रहन-सहन, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना है, तो प्रेमचंद को पढो”| उन्होंने ग्रामीण भारत को न केवल नजदीक से देखा Tथा बल्कि जिया भी था| उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन पात्रों को स्थान दिया चाहे उनके नाम वह न हों लेकिन वह घटनाएँ ग्रामीण भारत में किन्हीं न किन्हीं नामों से जरुर घटित हुई है, वास्तविक रूप से कहा जाय तो मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं  में जो चित्र प्रस्तुत किया गया है वह हुबहू गांवों में देखने, समझने को मिल जायेगा| 

उंच-नीच की खांiई, सामंतवाद की झलक, जातिवाद, महाजनी अत्याचार, सूदखोरों का अन्याय और शोषण से उनका साहित्य-समाज का दर्पण बन जाता है| मानव, मानव का कितना शोषण करता है तथा उसके किये का भी पूरा प्रतिफल उसे नहीं देता बल्कि उसे दुतकारता है, उन्होंने जन साधारण की भावनाओं, उनकी समस्याओं को समझा तथा उसका मार्मिक चित्रण किया है, इसलिए प्रेमचंद देश-विदेश में आदर के पात्र रहे हैं| प्रगतिशील लेखक संघ के लोग प्रेमचंद को प्रथम प्रगतिशील लेखक मानते हैं, वे साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद से लड़ने के लिए उनकी कृतियों को प्रेरणा स्रोत मानते हैं, तथा उसे पढ़कर उपरोक्त बुराईयों को दूर करने में लगे हुए हैं| मुंशी प्रेमचंद ने कफ़न कहानी में सामाजिक बुराईयों का चित्रण बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है, धीसू, माधव और बुधिया पात्र के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि जब जरूरतमंद को आवश्यकता है तो समाज उसकी मदद नहीं करता तथा अंतिम यात्रा में करुणा और दया से लबरेज हो जाता है, इसी कहानी में उन्होंने कामचोरी, नशे की लत पर भी प्रहार किया है| इस कहानी में यथार्थवाद की झलक मिलती है, पूर्ण संवेदना भी तथा सामंती व्यवस्था पर चोट भी की है| समाज के असामाजिक तत्वों को  लोक-लाज का भी डर नहीं है| 



मुंशी प्रेमचंद महात्मा गाँधी के विचार-दर्शन से प्रभावित थे| वे समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में नया सबेरा आये प्रयत्नशील रहे तथा अपने लेखन का आधार बनाया, उन्होंने लाशें नहीं ढोई, वर्तमान परिस्थितियों पर लिखा, वे अनमेल, बाल विवाह के विरोधी तथा विधवा विवाह के पक्षधर रहे, उन्होंने महाजनी प्रथा को सामाजिक कोढ़ तथा शोषण का हथियार माना, आज भी समाज में सूदखोर आर्थिक दृष्टि से कमजोर, जरूरतमंद, रेहड़ी, पटरी वाले, छोटा-मोटा कारोबार करने वालों का उसी तरह से शोषण और दोहन कर रहे हैं जैसे पहले करते थे| उन्हें जरा भी संवेदना नहीं है, उनके साथ जोर-जबरदस्ती भी करते है व असम्मान जनक भाषा का प्रयोग करते है, सरकार भी जरुरतमंदों के लिए बैंकों से व्यवस्था करने में असफल सिद्ध हो रही है, सरकार को गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों के लिए उचित व्यवस्था करनी चाहिए, तभी मुंशी प्रेमचंद के सपनों का भारत बन सकता है, 1936 में आप इस संसार को छोड़कर चले गये, आप की साहित्य सृजन की कला, सामाजिक असमानता, शोषण, सामंती व्यवस्था पर कड़ा प्रहार जन-जन का मार्ग दर्शन करते रहेंगें|

लेखक: राम दुलार यादव (शिक्षाविद) 

लोक शिक्षण अभियान ट्रस्ट 

संस्थापक/अध्यक्ष