पचहत्तर वें स्वतंत्रता दिवस पर मेरी यह कविता अपने भारत देश को समर्पित



देश मेरे तेरे लिए मेरा भी ये रोल आया
तेरी जान पर मैं सदके यह बोल आया

मेरा ये बदन तेरे रंगों में रंगा हुआ आये
रंग तिरंगे का मैं शहादत को घोल आया

निजामे मुल्क जो चला रहा उससे ये पूछूं
सरहदों की रक्षा में कहाँ पर तु झोल पाया

लहू में रोज सन्ती सरहदें यहाँ क्यों बताओ
ओ देश बेचने वालों क्या तुमने मोल लगाया

खड़ी हुई क्यों बैसाखियों के दम पे भारत माँ
राणा शिवाजी बेटे थे उसके तो अनमोल पाया

देश मेरे अदब से करना होगा तय सफ़र ये मुझको
नजरों में अपनी तेरे लिए जगह मै भी टोटल आया

पाक को देगा दुआएं कब तक तू एक बाप बनकर 
उसके जुर्म पे कूट दें उसको जो ज़हर का घोल पाया

उसके जुर्म पे कूट दें उसको
कविता अशोक सपड़ा की दिल्ली से
जय हिंद जय भारत