गाँव, गरीब, किसान मसीहा, पूर्व प्रधानमंत्री, राष्ट्र नायक, आदरणीय चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि 29 मई 2022 पर विशेष


स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी के दर्शन व विचार से प्रभावित आर्थिक, राजनीतिक चिंतक, किसानों, पिछड़ों, निर्धन व दलितों के मसीहा, देश की जनता के उत्थान के लिए संघर्षरत अद्भुत व्यक्तित्व, विलक्षण प्रतिभा के धनी स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को गाजियाबाद जनपद के नूरपुर गांव के साधारण किसान परिवार में हुआ थाI प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात आप 1925 में आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में मास्टर डिग्री, 1926 में वकालत पास की। आप शुरू से ग्रामीण  पृष्ठ  भूमि की समझ रखने वाले निर्भीकता से अपनी बात कहने वाले ईमानदार नेता के रूप में जाने जाते हैंI 1928 में गाजियाबाद में आपने वकालत शुरू की इसी बीच 1930 में गांधी जी के “सविनय अवज्ञा आंदोलन” में भाग ले, नमक कानून तोड़ते हुए गिरफ्तार हुए तथा 6 महीने जेल में रहे, 1942 में गांधीजी के आह्वान पर “अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन” में जेल चले गए तथा “करो या मरो” नारे के साथ लगातार प्रचार करते रहे, डीआईआर में बंद हुए, 1 साल जेल में रहे, 1943 में रिहा हुए, आपने जेल में ही 'शिष्टाचार' नामक पुस्तक लिखी तथा अंग्रेज लेखक स्टार्क के कथन को हवाला देते हुए कहा की शिष्टाचार अंक गणित के शून्य के समान है, चाहे वह स्वयं मूल्य ना रखता हो किंतु वह दूसरे के मूल्य को कई गुना बढ़ाने की सामर्थ्य रखता है।

शिक्षा पूर्ण करने के बाद गाजियाबाद में वकालत करते हुए आपने जिला कांग्रेस कमेटी का गठन किया, अपनी कार्यकुशलता, पूर्ण मनोयोग से कार्य करने के कारण सन 1937 में पहली बार उत्तर प्रदेश में बागपत गाजियाबाद क्षेत्र से "धारा" सभा के लिए चुन लिए गए| 1938 में धारा सभा जो आज उत्तर प्रदेश की विधानसभा है निर्वाचित हुए| चौधरी साहब ने 1939 में ‘कर्ज मुक्त विधेयक’ धारा सभा से पास कराया जिससे उत्तर प्रदेश के लाखों किसान कर्ज के जाल से मुक्त हो गए।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा में चौधरी साहब संसदीय सचिव, राजस्व मंत्री, सूचना, विधि एवं न्याय, कृषि ,वन, सिंचाई और गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों में सफलता पूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन किया तथा अपनी प्रशासनिक समझ से उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री बने, उत्तर प्रदेश में चौधरी साहब पक्के इरादे, दूरदृष्टि व निर्भीकता पूर्वक ऐसे उल्लेखनीय कार्य किए जिससे करोड़ों किसान गरीब   लाभान्वित  हुए।

“जमीदारी उन्मूलन, भूमि सुधार बिल” 1952 में पास करवाया, इस विधेयक के पारित हो जाने से किसान, जमीदार व बिचौलियों के शोषण से मुक्त हुए, परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश के सभी काश्तकारों को जिस जमीन में वह हल चलाते थे, एक झटके में सिरदार बना दिया, 10 गुना लगान सरकारी खजाने में जमा कर, भूमिधर खेत के मालिक बन गए| 1953 में चकबंदी कानून पास करवाकर किसान की दूर दराज पड़ी जमीन को एक जगह कर दिया, जिससे किसान, मजदूर को काम करने में सरलता हुई, अन्न का उत्पादन बढ़ने से देश व उत्तर प्रदेश की जनता को लाभ हुआ, जमींदारी उन्मूलन से उन गरीबों को लाभ हुआ, वे जहां रह रहे थे, जहां उनके पेड़ कुंवे थे, वह उनके स्वामी हो गए, उनकी आबादी दर्ज हो गई| बिचौलियों के शोषण से न केवल किसान मुक्त हुए बल्कि गांव में रहने वाले धनहीन जातियां, दलित, अति पिछड़े भी लाभान्वित हुए, चौधरी चरण सिंह जी ने दूसरा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना पैदा कर उन सोते हुए लोगों को जगा कर तथा संगठित कर राजनीति में भागीदारी दिलवाकर सत्ता का नया केंद्र स्थापित किया, जिसका परिणाम कई प्रदेशों में सरकार में अति पिछड़े, पिछड़े और दलितों का कब्जा हो गया, वह मुख्यमंत्री भी बने, आज वह राजनीति में रहकर प्रदेश व देश के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं|

चौधरी चरण सिंह के उपरोक्त कार्य की सराहना बहुसंख्यक जनता में हुई, लेकिन अभिजात्य वर्ग उनका इसलिए विरोधी हो गया कि एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर चौधरी चरण सिंह ने इतना बड़ा कार्य कर दिया जो विश्व के इतिहास में मील का पत्थर बना। चौधरी साहब का सराहनीय कार्य उन लोगों को अच्छा भी नहीं लगा वे लोग चौधरी चरण सिंह के विरोध में खड़े हो गए तथा दुष्प्रचार में लग गए लेकिन लोह पुरुष चौधरी चरण सिंह इससे विचलित नहीं हुए तथा उनका जवाब देने के लिए उत्तर प्रदेश में "भूमि सुधार और कूलक वर्ग" नामक पुस्तक लिखी| चौधरी साहब ने दो रु० तक के किसानों के लगान माफ कर दिए तथा 6:30 एकड़ जोत पर लगान आधा कर दिया, अफसोस इस बात का रहा कि अभिजात्य वर्ग उनका विरोधी तो रहा ही लेकिन जिनके उत्थान के लिए चौधरी साहब जीवन  पर्यन्त संघर्ष करते रहे उन्होंने भी उनका पूरा साथ नहीं दिया, गांव के पटवारी किसानों का शोषण करते थे चौधरी साहब ने एक झटके में उनके बस्ते तहसील में रखवा लिया तथा उनकी जगह लेखपाल भर्ती कर दिया।  27 हजार  लेखपालों में 30 परसेंट अनुसूचित जाति के लोगों को नौकरी मिली।

25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित हुआ, जेल से रिहाई के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, आप गृह, वित्त मंत्रालय ,उप प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह गांधीजी की आर्थिक नीतियों के प्रबल पक्षधर रहे। आप चाहते थे कि भारत में बेरोजगारी की समस्या भयावह है इसका निदान लघु, कुटीर तथा मझोले उद्योगों को प्रोत्साहन देकर हो सकता है| चौधरी साहब का मानना है कि जो वस्तुएं छोटे उद्योगों में बन सकती है, उन्हें बड़े-बड़े उद्योगों को बनाने के लिए लाइसेंस न दिया जाए। कई प्रख्यात विदेशी अर्थशास्त्री तथा अर्थशास्त्री जेडी सेठी ने कहा कि भारत में आर्थिक विचारधारा या तो गांधीजी की थी या चौधरी चरण सिंह की’ आर्थिक समझ बेजोड़ है, जिससे भारत का आर्थिक विकास हो सकता है| चौधरी चरण सिंह ने अपनी बात स्पष्ट करने के लिए “भारत की भयावह आर्थिक स्थिति कारण और निदान” नामक पुस्तक लिखी, चौधरी चरण सिंह, पंडित जवाहरलाल नेहरु की सामूहिक खेती के सिद्धांत के विरोधी तथा व्यक्तिगत खेती के पक्षधर रहे। चौधरी साहब धार्मिक पाखण्ड, अन्ध विश्वास के घोर विरोधी रहे, वे मूर्ति पूजा के खिलाफ थे तथा कभी मन्दिर नहीं गये| 

चौधरी साहब किसान परिवार में पैदा हुए विलक्षण प्रतिभा और कुशाग्र बुद्धि के बल पर सार्वजनिक जीवन में देश समाज के हित में कार्य किया, लेकिन कुछ  संकीर्ण  मानसिकता के लोग उन्हें समझ नहीं पाए, उनकी प्रशंशा तो दूर उनके विरोध में ही रहे, उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव जाति के उत्थान में और देश के विकास में लगाया, लेकिन उसी वर्ग के कारण चौधरी साहब को भारत रत्न जो बहुत पहले मिल जाना चाहिए था आज तक नहीं मिला, उनकी घटिया सोच को प्रदर्शित करता है।

चौधरी साहब आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी सार्वजनिक जीवन में उनकी ईमानदारी नैतिकता, सदाचार, शिष्टाचार तथा उनके भाषण और लेख लिखी गई पुस्तकें  सार्वजनिक जीवन में किए गए कार्य, करोड़ों उनके समर्थकों का मार्गदर्शन करते रहेंगे  हम शत-शत नमन, वंदन करते हैं, हम आप के बताए मार्ग पर एक कदम चल सके, यही आपके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।



लेखक:

रामदुलार यादव शिक्षाविद 

संस्थापक/अध्यक्ष

 लोक शिक्षण अभियान ट्रस्ट